पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि पहली बार सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है, ऐसा नहीं है। पिछले दो-तीन दशकों की ही बात करें तो शायद ही कोई साल बीता हो, जब तेल की कीमतों पर सरकार और विपक्ष के बीच नूराकुश्ती न हुई हो। इस बात से भला कौन इन्कार कर सकता है कि रोजमर्रा के कामकाज से लेकर हर छोटी-बड़ी कारोबारी गतिविधियां पेट्रोल-डीजल से ही चलती हैं। पेट्रोलियम पदार्थो के उत्पादन, वितरण और विनिमय से जुड़े नीतिगत और बाजार आधारित निर्णय एक ओर जहां अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित करते हैं। वहीं तेल पर लिए गए फैसले हर उपभोक्ता की जेब से जुड़े होने के कारण राजनीतिक दलों को मुद्दों की शक्ल में खाद-पानी भी मुहैया कराते हैं। किसी भी वस्तु की कीमतों के निर्धारण में मांग और आपूर्ति के सीधे-सपाट संबंध को समझने के लिए अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं है।

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